जनमत एक्सप्रेस। सदक़ा ए फ़ित्र हर मुस्लमान आज़ाद मालिके निसाब पर वाजिब है, मर्द मालिके निसाब पर अपनी तरफ से और अपने छोटे बच्चों और मजनून औलाद अगरचे बालिग हो की तरफ से भी वाजिब है। अगर बच्चा या मजनून औलाद खुद मालदार हों तो उनका सदक़ा उन्ही के माल से अदा किया जायेगा।
ईद के दिन सुबह सादिक़ तुलु होते ही मालिके निसाब पर सदक़ा ए फ़ित्र वाजिब होता है, ईद से पहले भी सदक़ा ए फ़ित्र अदा करना जायज़ है।
सदक़ा ए फ़ित्र की मिक़्दार यह है – गेहूं या उसका आटा आधा सा (मौजूदा दौर में 2 किलो 47 ग्राम), खजूर, मुनक़्क़ा या जौ एक सा (मौजूदा दौर में 4 किलो 94 ग्राम) है।
जमात रज़ा ए मुस्तफ़ा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सलमान हसन खांन (सलमान मियां) ने बताया कि अहले खैर हज़रात (मालदार लोग) को चाहिए अपनी माली हैसियत के मुताबिक सदक़ा ए फ़ित्र अदा करें। लोगों को चाहिए कि खजूर, मुनक़्क़ा या जौ की मिक़्दार से सदक़ा ए फ़ित्र अदा करें।
सलमान मियां ने कहा कि रमजान में तीन अशरे होते हैं कि पहले अशरे (1 रमज़ान से 10 रमज़ान) में रहमत है, दूसरे अशरे (11 रमज़ान से 20 रमज़ान) में मगफिरत यानी माफी है और आखिरी अशरे (21 रमज़ान से 30 रमज़ान) में जहन्नम की आग से बचाव है। रहमत का अशरा निकल गया अब दूसरे अशरे का खैर मक़दम करें और रोजे रखकर मोमिन (मुसलमान) इस अशरे में खुदा की इबादत करके अपने गुनाहों से माफी के तलबगार हों।


