बदायूॅं जनमत। आज शुक्रवार 26 जून को यौमे आशूरा के मौके पर शिया और सुन्नी समुदाय ने जुलूस ए हुसैन निकाल कर कर्बल के शहीदों के लिए अकीदत पेश की। जुलूस ए हजारों की संख्या में पहुंचे लोगों ने लब्बैक या हुसैन की सदाएं बुलंद कीं। अखाड़े का भी आयोजन हुआ। बाद नमाज जुमा से ही फात्हांख्वानी और लंगरदारी का दौर शुरू हो गया जो शाम तक चला।
बदायूं शहर का कदीमी जुलूसे हुसैनी शिया तनज़ीमुल मोमिनीन कमेटी और अन्जुमन जुल्फ़ेकारे हैदरी (रजि.) की सरपरस्ती में कादरी गेट, चक्कर की सडक से आरम्भ होकर शिया मस्जिद काज़ी हौज़ पर जाकर समपन्न हुआ। अपने-अपने ताज़िया स्थल से 12 ताज़ियादारों अनवर आलम, मोहसिन जैदी, नबी हैदर, अनफ रिज़वान, जाबिर जैदी, शुजा, नवेद, डॉ. आब्दी, जावेद अब्बास, हसन आरज़ू एंव गुलाम अब्बास अलम और ताज़ियों के साथ तथा समस्त शिया समुदाय के लोग नौहा ख्वानी और मातम करते हुऐ या हुसैन या हुसैन की सदाओं के साथ जुलूस में शामिल हुऐ। जुलूस में पानी एवं शरबत की सबीलें भी लगाई गईं। शिया समुदाय की महिलाओ एवं छोटे-छोटे बच्चों ने भी जुलूस में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया।
जुलूस के आरम्भ में मौलाना सैफ अली जैदी और शिया तनज़ीमुल मोमिनीन कमेटी के सदर अनवर आलम ने तक़ीर की जिसमें करबला और शहादते इमाम हुसैन अ०स० के बारे में बताया गया। तकरीर के बाद शाने हसन, मुरतज़ा जैदी और कम्बर रज़ा ने कताअत पढ़ी। जुलूस की निज़ामत डॉ एसजी अब्बास ने की। जगह-जगह रूक कर नौहा आनी की गई। जिसमें अहसान रज़ा, आमिर अब्बास आब्दी, कैफी जैदी, कमर अब्बास, जुनैद अब्बास, मिनहाल जैदी और रज़ा जैदी ने नौहे पेश किये। जुलूस के काज़ी हौज पहुंचने के बाद वहां ताज़िये दफन किये गये और फातिहा ख़्वानी की गई।
वजीरगंज जनमत। माहे मुहर्रम के यौमे आशूरा के मौके पर हज़रत इमाम हुसैन की याद में घर घर में लंगर, फातिहा ख्वानी और कुरान ख्वानी हुई। सुबह से ही मुस्लिम समुदाय के लोगों ने अपने अपने घरों पर कुरान की तिलावत और नात्ख्वानी की। मस्जिदों में नमाज़ के बाद हज़रत इमाम हुसैन कि शान में तकरीरे हुई और नगर के प्रमुख प्रमुख मुहल्लों में दस दिन लगातार जलसे का आयोजन किया गया। हज़रत इमाम हुसैन की याद में लोगों ने एफएम हाईवे पर राहगीरों के लिए हलवा, फल, चाय और शरबत समोसा व आइसक्रीम लंगर के स्टाल लगा कर अपनी अकीदत का इज़हार किया।
सैदपुर जनमत। यौमे आशूरा के मौके पर लोगों ने अपने अपने घरों के सामने कर्बला के शहीदों की याद में सबीलें लगवाईं व ताजिये बनाये। देर शाम तक लोग इस पाक माह की निस्बत से इबादत में मसरूफ़ रहे। कस्बे में थरमाकॉल से इंग्लैंड की शाहजहां मस्जिद इंग्लैंड, इस्लामिक सेन्टर अमेरिका, मस्जिद अफगनिस्तान, रोजा इमाम हुसैन, रोज़ा गौसे पाक आदि का नक्शा तय्यार किया गया। इसके अलावा फैजान-ए-मुस्तफा कमेटी की ओर से मोहल्ला रज़ा नगर रूहुल मस्जिद पर लंगर का अहतमाम किया गया। इस दौरान सभासद अकरम खान, खालिद सलमानी, फहीम सलमानी, जुबैर सलमानी, फैजान सैफी, अफ्फान सलमानी, उवैस सलमानी आदि मौजूद रहे।
उसहैत जनमत। माहे मोहर्रम की दस तारीख (यौमे आशूरा) के मौके पर नगर में जुलूस-ए-हुसैन निकाला गया। बाद नमाज ए जुमा हजारों की संख्या में लोग बड़े इमामबाड़े पर पहुंचे। जहां से जुलूस-ए-हुसैन का प्रारंभ होकर नगर की बीच वाली मस्जिद, हुसैनी गली, बस स्टैंड, मोहल्ला पश्चिम होते हुए करबला पहुंचा। इस दौरान दर्जनों ज्यारतों की झांकियां भी निकाली गईं, साथ ही हुसैनी अखाड़े में जांबाजों ने लकड़ी खेली। वहीं दोपहर से शाम तक फात्हांख्वानी और लंगरदारी का दौर चलता रहा। मस्जिदों के इमामों ने करबला का बयान किया। जिसमें कर्बला के 72 शहीदों की शहादत पर रौशनी डाली गई। उन्होंने कहा कि मौला हुसैन की शहादत से इस्लाम हमेशा के लिए महफूज हो गया। वहीं सुरक्षा की दृष्टि से थाना प्रभारी देवेन्द्र सिंह के नेतृत्व में पुलिस बल तैनात रहा।
इस मौके पर आयोजक सैयद आसिम अहमद, कमेटी अध्यक्ष आसिफ नियाजी, सैयद शाहिद अली, मुश्ताक खलीफा, मुअज्जम नियाजी, अशरफ, दानिश नियाज़ी, हन्नान, फिरासत नियाजी आदि मौजूद रहे।
मुहर्रम की दस तारीख का इतिहास…
मोहर्रम हिजरी कैलेंडर का पहला महीना है और इसी महीने से नया हिजरी साल शुरू होता है। मोहर्रम की दस तारीख को यौमे आशूरा कहा जाता है और मोहर्रम की दस तारीख से इस्लामी इतिहास की बहुत सी महत्वपूर्ण घटनाएं जुड़ी हैं। इसीलिए इस महीने का मुसलमान बहुत आदर करते हैं। इस महीने की दस तारीख यानी यौमे आशूरा को हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की तौबा कुबूल हुई, इसी दिन नूह अलैहिस्सलाम की कश्ती तूफान से निकली थी, इसी दिन हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को फिरऔन के जुल्म से निजात मिली थी। मुहर्रम की दस तारीख को ही हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम को लंबी बीमारी से निजात मिली थी। दस मोहर्रम को ही हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम मछली के पेट से बाहर निकले थे और दस मुहर्रम को ही हज़रत इमाम हुसैन ने सच्चाई कि विजय के लिए अपनी शहादत दी थी। मोहर्रमकी दस तारीख को अधिकतर मुसलमान रोजा भी रखते हैं।









