बदायूँ जनमत। बज्मे सुखन के मोहल्ला सोथा कार्यालय पर मासिक तरही मुशायरे का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का संचालन कुमार आशीष ने किया, जबकि अध्यक्षता इक्तिदार इमाम ने की। शायरों ने बेहतरीन गजले सुना कर साहित्यिक माहौल को खुशनुमा बना दिया।
सादिक अलापुरी ने नात-ए-पाक से आगाज किया। गजल में उन्होंने सामाजिक विषमता पर कहा- मुहब्बत भी किसी की ऐब लगती है ग़रीबी में,
हुनर लगते हैं उसके ऐब जो जरदार होता है।
अरशद रसूल ने वतन और कुर्बानी को केंद्र में रखते हुए पढ़ा- वतन के वास्ते जो जिंदगी कुर्बान करते हैं,
उन्हीं के खून से इतिहास का सिंगार होता है।
दानिश बदायूंनी ने इल्म और हुनर की अहमियत पर कहा- अलिफ बे से नहीं वाकिफ उसे उस्ताद कहते हो,
जिसे हो दसतरस लफ़्ज़ों पे वो फनकार होता है।
आज़म फ़रशोरी ने कहा- परिंदा कहने को हर इक मियां परदार होता है,
मगर परवाज़ में सबका अलग मेयार होता है।
कुमार आशीष ने सच की राह की कठिनाइयों पर कहा- ये माना रास्ता सच का बहुत दुश्वार होता है,
मगर कब झूठ से इंसां का बेड़ा पार होता है।
डॉ. शम्स मुजाहिदी ने गुदगुदाया- महकती संदली सांसें गुलाबी जिस्म की खुश्बू,
मेरे महबूब का बोसा भी खुशबूदार होता है।
सुरेंद्र नाज़ बदायूंनी ने मेहनतकश लोगों की भागम भाग जिंदगी की तरफ इशारा किया- हमें हर इक महीने के सभी दिन एक जैसे हैं,
किसी मजदूर की किस्मत में कब इतवार होता है।
शायरों की रचनाओं पर उपस्थित साहित्यप्रेमियों ने दाद देकर उनका उत्साहवर्धन किया। कार्यक्रम में आहिल रसूल और रजत गौड़ का विशेष सहयोग रहा। अरशद रसूल ने बताया कि इस साहित्यिक सिलसिले का अगला कार्यक्रम 5 सितंबर को आयोजित किया जाएगा। अगले तरही मुशायरे के लिए तरही मिसरा “नाम सभी का शामिल है अफसाने में” तय किया गया है।

