जामिया हमदर्द को मिला अनमोल हीरा; प्रो. एम.जेड. आब्दीन बने ऑफिसिएटिंग वाइस चांसलर

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नई दिल्ली जनमत। जब किसी इदारे को सच्चा रहनुमा मिलता है तो उसकी तकदीर बदल जाती है। जामिया हमदर्द के लिए आज वैसा ही ऐतिहासिक दिन है। यूनिवर्सिटी ने अपने सबसे काबिल, सबसे तजुर्बेकार और दुनिया में हिंदुस्तान का नाम रोशन करने वाले साइंटिस्ट प्रोफ़ेसर एम जेड आब्दीन को ऑफिसिएटिंग वाइस-चांसलर की जिम्मेदारी सौंपी है।
ये खबर सुनते ही यूनिवर्सिटी से मोहब्बत करने वाले हर शख्स के चेहरे पर खुशी है। क्योंकि सब जानते हैं कि प्रो. आब्दीन साहब वो शख्सियत हैं जो जामिया हमदर्द को एक अच्छे मुकाम पर लेकर जा सकते हैं।

कौन हैं प्रो. एम जेड आब्दीन? 40 साल का इल्मी सफर…

प्रो. आब्दीन साहब की शख्सियत किसी तआरुफ की मोहताज नहीं। 40 साल रिसर्च और 36 साल पढ़ाने का तजुर्बा रखने वाले प्रो. आब्दीन साहब का जामिया हमदर्द से दशकों पुराना रिश्ता है।
वो इस वक्त स्कूल ऑफ केमिकल एंड लाइफ साइंसेज में बायोटेक्नोलॉजी डिपार्टमेंट में प्रोफेसर हैं और सेंटर फॉर एनवायरनमेंट एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट के डायरेक्टर हैं। उन्होंने एएमयू से बी.एससी., एम.एससी. किया और देश के सबसे बड़े कृषि अनुसंधान संस्थान आईएआरआई, नई दिल्ली से 1991 में प्लांट फिजियोलॉजी में पीएचडी किया, जिसमें बायोकेमिस्ट्री और मॉलिक्यूलर बायोलॉजी उनके माइनर सब्जेक्ट रहे।
उनकी काबिलियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने यूनिवर्सिटी का हर बड़ा ओहदा ईमानदारी से संभाला है। डीन, फैकल्टी ऑफ साइंस; हेड, बायोटेक्नोलॉजी; फाइनेंस ऑफिसर; चेयरमैन, बोर्ड ऑफ स्टडीज; और एग्जीक्यूटिव काउंसिल व एकेडमिक काउंसिल के मेंबर तक। वो राजस्थान की सिंघानिया यूनिवर्सिटी के वाइस-चांसलर भी रह चुके हैं। उनके इस लंबे तजुर्बे ने ही हमदर्द को हमेशा आगे बढ़ाया है।

आंकड़ों में एक महान वैज्ञानिक…

1- 250 से ज्यादा रिसर्च पेपर, 28 रिव्यू, 8 किताबें, 45 बुक चैप्टर और जेनबैंक में 147 जीन सीक्वेंस।
2- 15,000 से ज्यादा साइटेशन, एच-इंडेक्स 66, आई-10 इंडेक्स 253
3- डीबीटी, डीएसटी, यूजीसी, आयुष से 10.06 करोड़ रुपये के 25 बड़े रिसर्च प्रोजेक्ट।
4- 54 पीएचडी स्कॉलर्स के सुपरवाइजर और 31 के को-सुपरवाइजर, 98 एम.एससी. छात्रों के मेंटर।
5- हंगरी में गेस्ट साइंटिस्ट, और अमेरिका, चीन, मॉरीशस, मलेशिया, सऊदी अरब में भारत का प्रतिनिधित्व।

दुनिया ने माना लोहा…

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी ने उन्हें दुनिया के टॉप 2 प्रतिशत सबसे प्रभावशाली वैज्ञानिकों की लिस्ट में रखा है। वो प्लांट साइंस में दुनिया के टॉप 3 प्रतिशत वैज्ञानिकों में हैं। उन्हें जे.जे. चिनॉय गोल्ड मेडल अवार्ड (2025), विज्ञान रत्न अवार्ड, बायो स्पेक्ट्रम एक्सीलेंस अवार्ड समेत 12 बड़े राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय अवार्ड मिल चुके हैं।

गेहूं के खेत से मलेरिया की दवा तक रिसर्च जो किसान और गरीब के काम आई…

उन्होंने साबित किया कि गेहूं में नाइट्रेट रिडक्टेस एंजाइम ज्यादा होने से पैदावार बढ़ती है और फूल आने पर थोड़ी खाद देने से दाने का वजन बढ़ता है। सरसों पर उनका काम ऐतिहासिक है। उन्होंने बताया कि सिर्फ नाइट्रोजन नहीं, बल्कि सल्फर और नाइट्रोजन को सही अनुपात में और सही समय पर देने से तेल की मात्रा, प्रोटीन और अच्छी क्वालिटी वाला तेल (ओलिक एसिड) बढ़ता है। ये खोज भारत में तेल-बीजों की क्रांति का कारण बनी।

मलेरिया की दवा आर्टिमिसिया एनुआ…

ये उनकी दुनिया को सबसे बड़ी देन है। मलेरिया की दवा आर्टिमिसिनिन इसी पौधे से बनती है, लेकिन पौधे में इसकी मात्रा बहुत कम होती है। प्रो. आब्दीन की लैब ने पहले इसकी जांच के लिए एचपीएलसी-मास स्पेक्ट्रोमेट्री तकनीक बनाई और फिर फ्लोरल-डिप तकनीक से ऐसे ट्रांसजेनिक पौधे बना दिए जिनमें दवा की मात्रा 200 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ गई। ये काम दुनियाभर में सराहा गया।

बिना कैलोरी वाली चीनी स्टीविया…

उन्होंने दुनिया में पहली बार खोजा कि छोटे आरएनए (miR319g, miRStv_11, miRStv_7) स्टीविया की मिठास को कंट्रोल करते हैं। इनको कंट्रोल करके उन्होंने ज्यादा मीठी और ज्यादा एंटीऑक्सीडेंट वाली स्टीविया बना दी। साथ ही उन्होंने एनएसी जीन (SrNAC21, SrNAC22, SrNAC52) की खोज की जो भविष्य में मेडिसिनल प्लांट्स की दुनिया बदल देगी।

हमदर्द का सच्चा हमदर्द कौन..?

आज हमदर्द दो रास्तों पर खड़ा है। एक तरफ वो लोग हैं जो काबिलियत, ईमानदारी और इल्म को पसंद करते हैं। जो चाहते हैं कि यूनिवर्सिटी को एक पढ़ा-लिखा, साइंटिस्ट और तजुर्बेकार लीडर मिले। वो सारे प्रोफेसर, छात्र और पुराने हमदर्दी आज प्रो. एम जेड आब्दीन साहब के साथ खड़े हैं। वो उनसे बेइंतहा प्यार करते हैं, उनकी इज्जत करते हैं क्योंकि वो जानते हैं कि यही शख्सियत हमदर्द को बचा सकती है, आगे ले जा सकती है।
वहीं दूसरी तरफ कुछ ऐसे अनासिर भी हैं जो पिछले कुछ वक्त से यूनिवर्सिटी को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। उनका मकसद इल्म को रोकना है। और जब वो यूनिवर्सिटी को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते हैं, तो असल में वो प्रो. आब्दीन साहब जैसी काबिल शख्सियत को भी नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते हैं। क्योंकि वो जानते हैं कि जब तक आब्दीन साहब जैसे ईमानदार और काबिल लोग कुर्सी पर हैं, उनके नापाक इरादे कामयाब नहीं होंगे। (लेखक : कमर अहमद)

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