जनमत एक्सप्रेस। दक्षिण फिल्मों के सुपरस्टार रजनीकांत ने शनिवार को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की। मुलाकात के दौरान उन्होंने सबसे पहले योगी आदित्यनाथ को देखते ही उनके पांव छुए। उसके बाद अगले दिन उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मुलाकात कर उनके गले लगे। सामाजिक जीवन में इसको शिष्टाचार के नजरिए से देखा जाता है, लेकिन बात जब दक्षिण भारत में भारतीय जनता पार्टी से लेकर नए बने सियासी गठबंधन INDIA को मजबूती के साथ स्थापित करने की हो तो दक्षिण भारत के हर वर्ग में महत्वपूर्ण दर्जा रखने वाले सुपरस्टार रजनीकांत का योगी आदित्यनाथ के पांव छूना और अखिलेश यादव के गले लगना सियासी हलचल तो पैदा करता ही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि दक्षिण भारत में खासतौर से तमिलनाडु में पांव छूकर न सिर्फ सियासत मजबूत होती आई है बल्कि सत्ताधीश नेताओं में शामिल जयललिता से लेकर करुणानिधि तक का दोबारा राजतिलक भी होता आया है। ऐसे में योगी के पांव छूने वाली तस्वीर को राजनीतिक जानकार दक्षिण भारत में भारतीय जनता पार्टी की सियासत के लिहाज से बड़ा रोड मैप तैयार तैयार करने वाली तस्वीर मान रहे हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि लोकसभा के चुनावों के लिहाज से योगी आदित्यनाथ के पांव छूने से भाजपा जहां दक्षिण भारत के सियासी मैदान में अपने सभी सियासी समीकरण मजबूत कर सकती है वहीं अखिलेश यादव के गले लगने से भी INDIA गठबंधन को भी मजबूती मिलने के आसार नजर आ रहे हैं। दक्षिण भारत के राजनीतिक विश्लेषक और चेन्नई के वरिष्ठ पत्रकार राघव माधवन कहते हैं कि योगी आदित्यनाथ के पांव छूने और अखिलेश यादव के गले लगने के राजनीतिक और सामाजिक मायने दोनों निकाले जा सकते हैं। उनका कहना है कि रजनीकांत की किसी बड़े सियासतदान के पांव छूने की ऐसी तस्वीर पहले कभी नहीं आई है। इसलिए इस तस्वीर को मजबूत सियासी नजरिया से देखा जा रहा है।
हालांकि, अखिलेश यादव का गले लगना भी इस वक्त के सियासी नजरिए से कमतर नहीं आंका जा सकता, क्योंकि रजनीकांत का तमिलनाडु से लेकर दक्षिण भारत के राज्यों में बड़ा जनाधार और फैन फॉलोइंग है। इसलिए भाजपा भी इस तस्वीर के सियासी मायने को दक्षिण भारत में अपनी चुनावी बिसात बिछाने में इस्तेमाल कर सकती है और अखिलेश यादव की तस्वीर भी उनके सहयोगी स्टालिन को तमिलनाडु में और मजबूती दे सकती है।
तमिलनाडु के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक राघव माधवन कहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी दक्षिण भारत में खुद को मजबूत करने और स्थापित करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रही है। क्योंकि समूचे दक्षिण भारत में खासतौर से तमिलनाडु में योगी के पांव छूने का व्यापक असर देखने को मिल सकता है। हालांकि उनका कहना है कि इसके लिए सिर्फ पांव छूने से ही भाजपा की मजबूती और उसका वोट बैंक नहीं बढ़ेगा बल्कि अब इसके बाद भारतीय जनता पार्टी को अपनी नई रणनीति के हिसाब से पूरी फील्डिंग भी सजानी होगी।
उनका कहना है कि अगर दक्षिण भारत में खासतौर से तमिलनाडु कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और केरल के हिस्सों में वहां के सुपरस्टार रजनीकांत के पांव छूने को सामाजिकता के बंधन में लपेटकर सियासी तौर पर आगे बढ़ाया जाए तो भारतीय जनता पार्टी दक्षिण भारत में एक बड़े जनमानस तक अपनी पहुंच बना सकेगी। हालांकि माधवन मानते हैं की पांव छूने की परंपरा सामाजिक भी है और राजनीतिक भी। अब निर्भर यह करता है कि उसको किस तरह लिया जा रहा है।
सियासी जानकारो का मानना है कि घोषणा करने के बाद भी भले ही रजनीकांत ने अपनी सियासी पार्टी का वजूद बरकरार न रखा हो लेकिन उनकी अपील में हमेशा से बड़ा दम नजर आया है। राजनीतिक विश्लेषक और चेन्नई के अन्नामलाई सेंटर ऑफ पॉलिटिक्स के प्रोफेसर आर. विश्वलिंगम कहते हैं कि रजनीकांत ने 1996 में तत्कालीन सरकार के विरोध में आवाज उठाई और लोगों ने उनकी इसी अपील के चलते तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता को सत्ता से उखाड़ फेंका था।
प्रोफेसर विश्वलिंगम कहते हैं कि 1996 में बनी करुणानिधि की सरकार बनने के पीछे सबसे अहम पहलू फिल्म स्टार रजनीकांत का मजबूती से समूचे तमिलनाडु में सत्ता पक्ष का विरोध करना शामिल था। इस बात को भरी सभा में करुणानिधि स्वीकार भी करते थे। वो मानते हैं कि दक्षिण भारत में इस वक्त किस तरीके से भारतीय जनता पार्टी अपने पांव जमाना चाह रही है उसमें योगी आदित्यनाथ के पांव छूने की तस्वीर भारतीय जनता पार्टी को एक नैरेरिव सेट करने के लिहाज से महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
वरिष्ठ पत्रकार राघव माधवन कहते हैं कि बेशक रजनीकांत की बनाई पार्टी वजूद में न हो लेकिन उनका नेटवर्क और उनके चाहने वालों की संख्या आज भी वहां पर किसी बड़े राजनेता से कम नहीं है। माधवन कहते हैं कि अपनी इसी छवि को देखते हुए सुपरस्टार रजनीकांत ने 31 दिसंबर 2017 को तमिलनाडु की सभी 237 सीटों पर अपनी पार्टी बनाकर चुनाव लड़ने की घोषणा भी की थी। रजनीकांत ने अपनी पार्टी “रजनी मक्कलम मंदरम” (आरएमएम) को बनाते ही 2021 में होने वाले विधानसभा के चुनावों में मजबूती के साथ जीतने की तैयारियां कर दी थी।
हालांकि, यह बात अलग है कि विधानसभा चुनावों के नजदीक आते ही उन्होंने अपनी पार्टी न सिर्फ भंग की बल्कि भविष्य में सियासत से दूर रहने की भी बात की। माधवन कहते हैं कि रजनीकांत ने कभी डीएमके तो कभी भारतीय जनता पार्टी के समर्थन के तौर पर अपनी पहचान बनाई। हालांकि दक्षिण के अन्य सिने स्टारों की तरह सक्रिय रूप से उस तरह राजनीति में नहीं आ पाए जिस तरह अन्य बड़े सिनेस्टार तमिलनाडु की राजनीति में सक्रिय रहे। लेकिन बीते कुछ वर्षों में भारतीय जनता पार्टी की और हुए उनके झुकाव की चर्चा सियासी गलियारों में लगातार बनी रही।
मनिपाल विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर मनोज अहलावत कहते हैं कि पैर छूने और छुआने का संस्कार तो हमारे यहां सनातन प्रक्रिया रही है। चुनावी माहौल में मायने यह रखता है कि ‘कौन’ ‘किसके’ और ‘किस मौके’ पर पांव छू रहा है। प्रोफेसर अहलावत कहते हैं कि जैसे नरेंद्र मोदी ने वाराणसी में अपने नामांकन के दौरान पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के पांव छुए तो यह एक सामाजिक शिष्टाचार के तौर पर ही देखा गया, लेकिन इसको अगर दूसरे नजरिए से देखें तो बड़ी बात यह थी कि पांव छूने वाला देश का प्रधानमंत्री है, और जिसके पास वह गए थे वह एक बड़े और कद्दावर नेता थे। प्रोफेसर मनीष अहलावत कहते हैं कि जब रजनीकांत ने योगी आदित्यनाथ के पांव हुए हैं तो इसका भी एक अर्थ निकाला जा रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि पैर छूने से रिश्ते तो मजबूत होते ही हैं लेकिन पैर छूने की परंपरा चुनावी माहौल के दौर में हो तो सीधे-सीधे वोटरों को आपस में बांधने का काम करती है। चूंकि रजनीकांत के दक्षिण भारत में इतने प्रशंसक हैं तो निश्चित तौर पर पांव छूने का बड़ा संदेश वहां पर जाएगा। वह कहते हैं कि दक्षिण भारत में तो पांव छूकर अपनी आस्था प्रकट करने की सियासी परम्परा हमेशा से चलती चली आ रही है।
दक्षिण में जयललिता के दौर में पांव छूने की परंपरा खूब रही। परंपरा अब भी है लेकिन जब जयललिता के सामने लोग जाते थे वे न सिर्फ उनके पांव छूते थे बल्कि उनके सामने लेटकर अपने हाथों को जयललिता के पांवों की ओर बढ़ाकर दंडवत हो जाते थे। पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री रहे प्रकाश सिंह बादल के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पांव छूकर ही आशीर्वाद लिया था। इसी तरह तमाम तल्खियों के बाद जब सपा और बसपा का गठबंधन हुआ तो डिंपल यादव ने मायावती के पांव छूकर आशीर्वाद लिया था।
सियासी जानकार कहते हैं कि पांव छूकर आशीर्वाद लेना और उसका सियासी संदेश जाना तय होता है। बस निर्भर करता है कि पांव छूने की टाइमिंग क्या है। पटियाला की पंजाबी यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र के पूर्व प्रवक्ता जगजीत अरोड़ा कहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब प्रकाश सिंह बादल के पांव हुए थे तो उसका एक बड़ा संदेश गया। दक्षिण भारत में जब जयललिता के सामने बड़े-बड़े नेता नतमस्तक हो जाते थे तो उसका एक बड़ा सियासी संदेश जाता था। अब जब योगी आदित्यनाथ के पांव छूकर दक्षिण भारत के बड़े स्टार रजनीकांत ने आशीर्वाद लिया है तो इसका असर तमिलनाडु की राजनीति पर नहीं होगा यह कहना गलत नहीं होगा।
लखनऊ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के प्रमुख प्रोफेसर मुकुल श्रीवास्तव कहते हैं कि रजनीकांत का योगी आदित्यनाथ के पांव छूना सियासी नजरिए से बिल्कुल नहीं देखा जाना चाहिए। उनका अपना मानना है कि एक संत के नाते या योगी के नाते दक्षिण के सुपरस्टार रजनीकांत ने योगी आदित्यनाथ के पांव छुए। इसको एक सामाजिक शिष्टाचार से आगे देखना खास तौर से सियासी नजरिए से देखना ठीक नहीं लगता है।
हालांकि, पटियाला की पंजाबी यूनिवर्सिटी से रिटायर पूर्व प्रोफेसर जगजीत अरोड़ा कहते हैं कि अगर पांव छूने से ही सियासत की तस्वीरें बदलती तो ना दक्षिण भारत में कभी जयललिता का सूर्यास्त होता और ना ही करुणानिधि का। वह कहते हैं कि इसी तरह डिंपल यादव ने मायावती के पांव छुए लेकिन चुनाव के बाद गठबंधन टूट गया। भारतीय जनता पार्टी और अकाली दल का गठबंधन टूट गया। अरोड़ा कहते हैं कि इसलिए यह कहना कि पांव छूने से सिर्फ और सिर्फ सियासत ही सधती है, यह सही नहीं है। पांव छूना और गले लगना भारतीय परंपरा में एक सामाजिक शिष्टाचार माना जाता है। हां, यह जरूर है कि सियासत के दरमियान इसके मायने भी निकाले जाते हैं और उसका एक संदेश भी होता है।
बहरहाल, रजनीकांत ने बेशक मुख्यमंत्री योगी के पांव छूकर और अखिलेश यादव के गले मिलकर जो भी सियासी संदेश दिए हों, लेकिन इससे दोनों ही खेमों में अटकलों का बाजार गर्म है। भाजपा में तो चर्चा है ही, विपक्षी गठबंधन भी अखिलेश के साथ रजनीकांत के गले मिलने को बेहद संजीदगी और उम्मीदों के साथ ले रहा है। उसे लग रहा है कि रजनीकांत का नैतिक समर्थन ही उनके जनाधार को दक्षिण में मजबूत करेगा।

