नेकियों और बरकतों की रात है शब-ए-बरात : हाफ़िज़ इरफ़ान

धार्मिक

बदायूॅं जनमत‌। शब ए बरात की आमद से पहले (सामाजिक संस्था) इस्लाहुल मुस्लेमीन एजूकेशन वेलफेयर सोसाइटी के अध्यक्ष व पूर्व जिला पंचायत सदस्य, हाफ़िज़ इरफ़ान ने आम मुसलमान को पैगाम दिया है।
उन्होंने कहा कि अल्लाह तआला ने उम्मत-ए-मोहम्मदिया को कई ऐसी महान और बरकत वाली रातें अता फरमाई हैं, जिनमें इबादत और रियाज़त गुनाहों की माफ़ी का ज़रिया बनती है और दुनियावी व आख़िरत की कामयाबी का कारण होती है। उन्हीं मुबारक रातों में से एक शब-ए-बरात है।
हज़रत अली (रज़ि.) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: “जब शबे-बरात आए तो रात को इबादत में मशग़ूल रहो और दिन में रोज़ा रखो।” अल्लाह तआला इस रात सूरज डूबने के साथ ही आसमान-ए-दुनिया पर ख़ास तजल्लि फ़रमाता है और फ़रमान होता है- क्या कोई मग़फ़िरत मांगने वाला है कि मैं उसे बख़्श दूँ? क्या कोई रोज़ी मांगने वाला है कि मैं उसे रोज़ी अता कर दूँ? क्या कोई बीमार है जो शिफ़ा चाहता हो कि मैं उसे शिफ़ा दे दूँ? यह आवाज़ सुबह तक आती रहती है।
शब-ए-बरात की इबादत यह है कि तस्बीह पढ़ी जाए, ज़िक्र व वज़ीफ़े किए जाएं, क़ुरआन-ए-करीम की तिलावत की जाए, क़ज़ा नमाज़ें अदा की जाएं और अपने गुनाहों से सच्ची तौबा की जाए। हाफ़िज़ इरफ़ान ने कहा कि नेकियों और बरकतों की रात है शब ए बरात।
उन्होंने कहा कि अफ़सोस की बात है कि कुछ नौजवान इस मुबारक रात को शोर-शराबे और ग़लत कामों में गुज़ार देते हैं। गलियों, सड़कों और बाज़ारों में बेवजह घूमते हैं। ऐसा करना बिल्कुल ठीक नहीं है, क्योंकि इससे दूसरों की इबादत में खलल पड़ता है और कई तरह के नुक़सान होने का अंदेशा रहता है। यह रात अल्लाह से माफ़ी मांगने, अपने लिए और अपने अज़ीज़-ओ-अक़ारिब के लिए दुआ करने की रात है।

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